आखिर क्यो उतर आते है juveniles हैवानियत पर

16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया पर सबसे ज्यादा जुल्म ढाए थे उसका आरोपी juvenile था। निर्भया केस मे पूरे घटनाक्रम का जिम्मेदार भी वही था। सिर्फ निर्भया केस मे ही नहीं बल्कि हर 4 मे से 1 मामले मे juveniles यानि किशोरों की direct या indirect भूमिका होती है। इन आकड़ों मे हाल ही के कुछ सालो मे तेजी से बढ़ोतरी देखी जा सकती है। किशोरों (juveniles) द्वारा गिरोह अपराध कई बार तो वयस्क अपराध की तुलना में भी कई अधिक देखे जा सकते है। पहले इनकी हिस्सेदारी चोरी और लुटपाट तक सीमित थी लेकिन पिछले 10-15 सालो मे मर्डर और दुष्कर्म मे भी इनका सीधा संबंध  (direct involvement) देखा जा सकता है। लेकिन इसकी असल वजह क्या है। पारिवारिक कारण, मातापिता, अपराधी भाईबहन, या फिर  आस पढ़ोस। क्या इन सभी चीजों की वजह से एक 16-17 साल का लड़का दुष्कर्म या मर्डर जैसे संघिन अपराध करता है। बिलकुल भी नहीं। ये सभी चीजे कुछ हद तक इंसान को प्रभावित कर सकती है लेकिन दुष्कर्म जैसे अपराधो की तरफ धकेल नहीं सकती। इसकी असल वजह है अश्लील फिल्मे(पॉर्न) और आपराधिक माहौल

 

अश्लीलता

पिछले 8-10 सालो मे लगभग हर बच्चे के हाथ मे मोबाइल देखा जा सकता है। internet के चलते कुछ भी ऐसा नहीं रह गया है जो पहुंच से बाहर हो. बड़ों की बात तो  छोड़ ही दो आजकल के teenagers भी पोर्न फिल्में देखने के लगातार आदी होते जा रहे हैं. इसमे कोई शक की बात नहीं है की इस तरह की चीजों से बच्चो का  मानसिक पतन ही नहीं बल्कि नैतिक पतन पतन भी होता जा रहा है। इस तरह के scenes बच्चो के दिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ते है। एक research के अनुसार, जो teenagers बहुत ज्यादा अश्लील फिल्मे देखते हैं उनका दिमाग सिकुड़ जाता है और उनकी संवेदनाएं(sensations) भी धीरे धीरे  कम हो जाती है जिनकी वजह से इन्हे  सही ओर गलत के बीच का फर्क पता नहीं लगता । अश्लील दृश्यो का दिमाग के विकास पर भी गहरा असर डलता है। neurologists की माने तो यह  इसके कारण  मनोविकार भी हो सकता है ।

 

 

 पोर्नोग्राफी ने पैदा किए है rapist

पोर्नोग्राफी की वजह से आज बच्चे व्यसक होने से पहले ही सेक्स के बारे मे जान जाते है। इसने हमारी संस्कृति को बहुत प्रभावित किया है। इसने ना केवल उन लोगो को  प्रभावित किया है जो इसे देखते है बल्कि ये उन लोगो पर भी प्रभाव डालता है जो इसे नहीं देखते। और इससे होने वाले खतरे का शिकार बनते है। यह हमारे देश की सुरक्षा के लिए खतरे की बात है। ज़्यादातर rapist ने यह माना है की  वे pornography विडियो देखते थे।

दिल्ली के गांधी नगर इलाके मे गुड़िया के उपर जिन जालिमो ने जुल्म ढाये थे उन्होने पूलिस को बताया था की पोर्नोग्राफी ने उन्हे ऐसा कृत्य करने के लिए उकसाया था।

 

हिंसक कृत्यो को बढ़ावा देता है पोर्नोग्राफी देखना।

पोर्नोग्राफी महिलाओ के सम्मान को कम करता है। पोर्नोग्राफी मे महिलाओ को ऐसे परदर्शित किया जाता है जिसमे वह पुरुषो के sexual pleasure के लिए एक वस्तु है। यह पोर्नोग्राफी ही है जिसमे महिलाओ को पुरुषो के सेक्सुअल वाइलैंस(men’s sexual violence) के लिए टारगेट के रूप मे दिखाया जाता है। आज हम जहां महिलाओ को पुरुषो के बराबर अधिकार देने की बात कर रहे है ऐसे मे पोर्नोग्राफी द्वारा महिलाओ के प्रति हिंसक घटनाओ को बढ़ावा देने और उनके सम्मान को कम करने से ऐसी धारणा को धक्का पहुचता है।

1986 मे neil malamuth द्वारा 42 आदमियो को लेकर रेप की संभावना पर एक प्रयोग किया गया।  malamuth ने पाया की आदमियो के द्वारा देखी गयी pornographic सामग्री की मात्रा का संबंध sexual assault से है और वह इस निष्कर्ष पर पहुचे की यदि आदमी पहले से sexually aggressive है और sexually aggressive pornography देखता है तो इस बात की ज्यादा संभावनाए है की वह sexually aggressive act करेगा। बाद मे कुछ campaigners ने इसी रिसर्च को लेकर सवाल उठाया की pornography रेप की तरफ ले जाती है।

 

पोर्नोग्राफी को खत्म करने के लिए उठाए गए कदम

kamlesh vaswani इंदौर के इस वकील ने 2013 मे सूप्रीम कोर्ट मे पॉर्न वैबसाइट को पूरी तरह से बैन करने के लिए pil (public interest litigation) डाला था। वह अपनी रिसर्च से इस निष्कर्ष पर पहुचे की ज़्यादातर rapist पोर्नोग्राफी देखते है। उनकी pil मे पोर्नोग्राफी के खतरनाक प्रभावों के बारे मे बताया गया। उनकी pil मे यह कहा गया की पॉर्न देखना देश की सुरक्षा को खतरे मे डालता है, हिंसक कृत्यो को प्रोत्साहित करता है, समाज मे अस्वीकार्य व्यवहारों का कारण है और महिलाओ की प्रतिष्ठा को कम करता है। वह ऐसा विश्वास करते है की ऑनलाइन पोर्नोग्राफी देखने का सीधा संबंध महिलाओ के प्रति बढ़ते अपराध से है। उनकी pil मे 850 पॉर्न वैबसाइट को बैन करने की बात कही गयी जिसके चलते हाल ही मे भारत सरकार ने उन websites को बैन भी कर दिया था। लेकिन बाद मे सरकार ने कहा की केवल hardcore और child porn sites ही बैन होंगे।

 

 

आपराधिक माहौल

आज अगर नाबालिगो की संघिन जुर्मो मे हिस्सेदारी बढ़ी है तो उसका एक और कारण है उनका ऐसे वातावरण मे विकसित होना जो उन्हे गलत राह की ओर धकेलता है।  जुआरियों और शराब  के अड्डे, गंदी बस्तियो के पास रहने पर बच्चों के अपराधी होने के अवसर अधिक रहते हैं । यही किशोर नशे के जाल मे फसते है। वह ऐसे लोगो के संपर्क मे आते है जो उन्हे गंदी लत लगाते है। आकड़ों के मुताबिक महानगरो मे लगभग 67 प्रतिशत 16 साल से नीचे के बच्चे नशा(सिगरेट, तंबाकू, गुटखा, चरस, गांजा इत्यादि ) का सेवन करते है। नशे की धूत मे इन्हे होश नहीं रहता की ये क्या कर रहे है और इन्हे इस बात की भी होश नहीं रहती की क्या गलत है और क्या सही। कुछ बच्चे तो इस कदर  नशे के आदि हो जाते है की जब उनके पास इन नशीले पदार्थो को खरीदने का पैसा नहीं होता तो वे चोरी, लूट, ह्त्या जैसे खतरनाक अपराध करते है। आपराधिक माहौल मिलने से बच्चे बलात्कार जैसे घिनोने अपराध करते है। ऐसे बच्चे जब गिरोह मे रहते है तो यह अपराध करने से नहीं डरते। गिरोह बाल अपराध में सहयोग करता है।

 

क्यो नहीं रहता नाबालिगो को सजा का डर

juvenile law कानून काफी कमजोर होने से बच्चो मे सजा का डर नहीं है। वही नाबालिगो को सजा का डर ना रहने के कुछ psychological कारण भी है नाबालिग उम्र मे बच्चे सोचते है की वे अनोखे (unique) है। वे सोचते है की वे सभी खतरो से से सुरक्षित है और इसलिए वे सावधानिया नहीं बरतते। बच्चे इस उम्र मे खुद को अनोखा साबित करने के लिए कल्पनाओ से भरपूर कहानिया अपने मन मे गढ़ते है जो की सच्चाई से परे है।  यही कारण है की वो इस उम्र मे शराब, धूम्रपान, नशे, और अश्लीलता की और बढ़ जाते है। ऐसे विश्वासों को psychology की भाषा मे personal fable कहा जाता है।

‘’It cannot happen to me because I am unique and special is a risky thought in this age’’

 

विधालयो मे value based education की कमी

बढ़ते आपराधिक मामले और नाबालिगो की इसमे भागीदारी हमारे देश के लिए चिंता का विषय है। विधालयो मे value based education के ऊपर ज़ोर ना होने से बच्चो मे नैतिकता का विकास नहीं हो पाता। विधालयों मे value education की कमी से बच्चो मे morality खत्म होती जा रही है। आज parents के पास बच्चो को समय देने का समय ही नहीं है। जिससे बच्चो को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। बच्चो मे अपने बढ़ो के प्रति सम्मान की भावना खत्म हो गयी है। बच्चे value based education पर ध्यान नहीं देना चाहता।

आज पोर्नोग्राफी और नशा करने को समाज का खुलापन समझा जाता है। यह खुलापन जो पश्चिमी सभ्यता से सीखा गया है। और इसी की वजह से हमारी भारतीय संस्कृति जहां महिलाओ को माँ, बहन, देवी का दर्जा दिया जाता है उसके प्रति इतनी हैवानियत दिखाई जाती है। औरत जिसने समय-समय पर परीक्षा दी है आज आधुनिकता के इस बदलते दौर मे दौबारा परीक्षा देने पर विवश है।

आज हर न्यूज़ चैनल और अखबारो मे चर्चा का विषय है की समाज अपनी सोच बदले। क्या बिना पोर्नोग्राफी sites को बैन किए और आपराधिक माहौल को खत्म किए बिना समाज मे बदलाव आ पाएगा। अश्लीलता के इस दौर मे क्या समाज अपनी सोच बदलेगा। कैसे? आप अपनी राय comments के द्वारा जरूर दे। 

 

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